'शायद शिव जी की पत्नी गौरी देवी रुष्ट होंगी, जबकि मैं रोज उनकी पूजा करती हूँ। हाय हाय, मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया उनका कि वे मेरे विरुद्ध हो गई हैं। लेकिन वे तो रूद्राणी हैं, रुद्र की पत्नी हैं, उनका नाम ही ऐसा हैं जो सबको रुला देता है। तो शायद वे और शिव जी चाहते हों कि मैं रोऊँ। लेकिन इतनी विपत्ति में पड़ी हुई, अपनी जान देने को तैयार हो चुकी हुई मुझ पर दया नहीं आती उनको? इसका कारण यह हो सकता है कि देवी जी गिरीजा हैं, दत्तक बेटी हैं, तो दयालु होंगी ही क्यों? अपने सती रूप में तो उन्होंने शरीर त्याग दिया था, अतएव अब वे शायद चाहती होंगी कि मैं भी शरीर त्याग दूँ।'
इस प्रकार आचार्य जी ने अपनी प्रखर काव्य-सहृदयता से इस श्लोक में प्रयुक्त अनेक नामों का भावार्थ किया है।
