श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 53: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  10.53.25 
दुर्भगाया न मे धाता नानुकूलो महेश्वर: ।
देवी वा विमुखी गौरी रुद्राणी गिरिजा सती ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
मैं अति दुर्भाग्यशाली हूँ क्योंकि सृष्टा विधाता मेरे अनुकूल नहीं है, न ही महेश्वर (शिवजी) हैं। अथवा शायद शिव-पत्नी देवी जो गौरी, रुद्राणी, गिरिजा तथा सती नाम से विख्यात हैं, मेरे विपरीत हो गई हैं।
 
I am extremely unfortunate because neither the Creator is favorable to me nor Maheshwar (Lord Shiva) or perhaps Shiva's wife Devi who is known by the names Gauri, Rudrani, Girija and Sati have turned against me.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती जी बताते हैं कि रुक्मिणी ने सोचा होगा कि 'श्रीकृष्ण जी चाहे भी आना चाहें तो रास्ते में ही उनको बनाने वाला ब्रह्मा रोक देगा, जो मेरी ओर से प्रसन्न नहीं है। लेकिन उनको प्रसन्न क्यों नहीं होना चाहिए? कहीं महेश्वर जी भगवान शिव तो नहीं हैं, जिनकी किसी मौके पर मैंने ठीक से सेवा नहीं की और वे मुझसे चिढ़ गये हैं। पर वे तो महेश्वर हैं, बड़े ईश्वर हैं, फिर मुझ जैसी छोटी और मूर्ख लड़की से उनको क्रोध क्यों आएगा।

'शायद शिव जी की पत्नी गौरी देवी रुष्ट होंगी, जबकि मैं रोज उनकी पूजा करती हूँ। हाय हाय, मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया उनका कि वे मेरे विरुद्ध हो गई हैं। लेकिन वे तो रूद्राणी हैं, रुद्र की पत्नी हैं, उनका नाम ही ऐसा हैं जो सबको रुला देता है। तो शायद वे और शिव जी चाहते हों कि मैं रोऊँ। लेकिन इतनी विपत्ति में पड़ी हुई, अपनी जान देने को तैयार हो चुकी हुई मुझ पर दया नहीं आती उनको? इसका कारण यह हो सकता है कि देवी जी गिरीजा हैं, दत्तक बेटी हैं, तो दयालु होंगी ही क्यों? अपने सती रूप में तो उन्होंने शरीर त्याग दिया था, अतएव अब वे शायद चाहती होंगी कि मैं भी शरीर त्याग दूँ।'

इस प्रकार आचार्य जी ने अपनी प्रखर काव्य-सहृदयता से इस श्लोक में प्रयुक्त अनेक नामों का भावार्थ किया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)