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bhagavat 10.51.36: भगवान बोले : हे मित्र, मैंने हजारों जन्म लिए हैं, हजारों जीवन जिया है और हजारों नाम धारण किए हैं। दरअसल मेरे जन्म, कर्म और नाम अनंत हैं, इसीलिए मैं भी उनकी गिनती नहीं कर सकता।   |   bhagavat अध्याय 10.51: मुचुकुन्द का उद्धार   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 51: मुचुकुन्द का उद्धार  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  10.51.36 
श्रीभगवानुवाच
जन्मकर्माभिधानानि सन्ति मेऽङ्ग सहस्रश: ।
न शक्यन्तेऽनुसङ्ख्यातुमनन्तत्वान्मयापि हि ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान बोले : हे मित्र, मैंने हजारों जन्म लिए हैं, हजारों जीवन जिया है और हजारों नाम धारण किए हैं। दरअसल मेरे जन्म, कर्म और नाम अनंत हैं, इसीलिए मैं भी उनकी गिनती नहीं कर सकता।
 
The Lord said: O friend, I have taken thousands of births; lived thousands of lives; and assumed thousands of names. In fact, my births, actions, and names are infinite, so much so that even I cannot count them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)