श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 50: कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  10.50.7-8 
हनिष्यामि बलं ह्येतद्भ‍ुवि भारं समाहितम् ।
मागधेन समानीतं वश्यानां सर्वभूभुजाम् ॥ ७ ॥
अक्षौहिणीभि: सङ्ख्यातं भटाश्वरथकुञ्जरै: ।
मागधस्तु न हन्तव्यो भूय: कर्ता बलोद्यमम् ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
[भगवान् ने सोचा] : चूँकि पृथ्वी पर यह सेना बहुत बोझ है, इसलिए मैं जरासंध की इस सेना को नष्ट कर दूँगा जिसमें पैदल सैनिकों, घोड़ों, रथों और हाथियों की अक्षौहिणियाँ हैं, जिसे मगध के राजा ने अपने अधीनस्थ राजाओं से एकत्रित करके यहाँ लाया है। लेकिन मुझे जरासंध को नहीं मारना चाहिए, क्योंकि भविष्य में वह निश्चित रूप से फिर से एक सेना इकट्ठा कर लेगा।
 
[भगवान् ने सोचा] : चूँकि पृथ्वी पर यह सेना बहुत बोझ है, इसलिए मैं जरासंध की इस सेना को नष्ट कर दूँगा जिसमें पैदल सैनिकों, घोड़ों, रथों और हाथियों की अक्षौहिणियाँ हैं, जिसे मगध के राजा ने अपने अधीनस्थ राजाओं से एकत्रित करके यहाँ लाया है। लेकिन मुझे जरासंध को नहीं मारना चाहिए, क्योंकि भविष्य में वह निश्चित रूप से फिर से एक सेना इकट्ठा कर लेगा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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