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श्लोक 10.50.54  |
सुधर्मां पारिजातं च महेन्द्र: प्राहिणोद्धरे: ।
यत्र चावस्थितो मर्त्यो मर्त्यधर्मैर्न युज्यते ॥ ५४ ॥ |
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| अनुवाद |
| इन्द्र श्री कृष्ण के लिए सुधर्मा सभा ले आए, जिसके भीतर खड़ा मनुष्य मृत्यु के नियमों से प्रभावित नहीं होता। इन्द्र ने पारिजात वृक्ष भी लेकर आकर दे दिया। |
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| इन्द्र श्री कृष्ण के लिए सुधर्मा सभा ले आए, जिसके भीतर खड़ा मनुष्य मृत्यु के नियमों से प्रभावित नहीं होता। इन्द्र ने पारिजात वृक्ष भी लेकर आकर दे दिया। |
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