श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 50: कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  10.50.5-6 
निरीक्ष्य तद्ब‍लं कृष्ण उद्वेलमिव सागरम् ।
स्वपुरं तेन संरुद्धं स्वजनं च भयाकुलम् ॥ ५ ॥
चिन्तयामास भगवान् हरि: कारणमानुष: ।
तद्देशकालानुगुणं स्वावतारप्रयोजनम् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण इस संसार के आदि-कारण हैं, लेकिन जब वे इस धरा पर अवतरित हुए तो उन्होंने मनुष्य की भूमिका निभाई। तब जब उन्होंने देखा कि जरासंध की सेना ने उनकी नगरी को उसी प्रकार से घेर रखा था, जैसे कि समुद्र अपने किनारों को तोड़कर बहने लगता है और जब उन्होंने देखा कि यह सेना उनकी प्रजा में भय पैदा कर रही है, तो भगवान ने इस पर विचार किया कि देश, काल तथा उनके वर्तमान अवतार के विशिष्ट उद्देश्य के अनुरूप उनकी उपयुक्त प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए।
 
यद्यपि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण इस संसार के आदि-कारण हैं, लेकिन जब वे इस धरा पर अवतरित हुए तो उन्होंने मनुष्य की भूमिका निभाई। तब जब उन्होंने देखा कि जरासंध की सेना ने उनकी नगरी को उसी प्रकार से घेर रखा था, जैसे कि समुद्र अपने किनारों को तोड़कर बहने लगता है और जब उन्होंने देखा कि यह सेना उनकी प्रजा में भय पैदा कर रही है, तो भगवान ने इस पर विचार किया कि देश, काल तथा उनके वर्तमान अवतार के विशिष्ट उद्देश्य के अनुरूप उनकी उपयुक्त प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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