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श्लोक 10.50.47  |
आवयो: युध्यतोरस्य यद्यागन्ता जरासुत: ।
बन्धून् हनिष्यत्यथवा नेष्यते स्वपुरं बली ॥ ४७ ॥ |
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| अनुवाद |
| “जब हम दोनों कालयवन से युद्ध में व्यस्त होंगे, तभी यदि पराक्रमी जरासंध आ जाते हैं तो वह हमारे कुटुम्बियों का वध कर सकते हैं या फिर उन्हें बंदी बनाकर अपनी राजधानी ले जा सकते हैं।” |
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| “जब हम दोनों कालयवन से युद्ध में व्यस्त होंगे, तभी यदि पराक्रमी जरासंध आ जाते हैं तो वह हमारे कुटुम्बियों का वध कर सकते हैं या फिर उन्हें बंदी बनाकर अपनी राजधानी ले जा सकते हैं।” |
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