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bhagavat 10.50.37-38: ज्यों ही भगवान नगरी में प्रवेश कर रहे थे, शंख और दुन्दुभियाँ बजने लगीं और कई ढोल, तुरहियाँ, वीणा, वंशी और मृदंग एक साथ बजने लगे। रास्तों पर पानी छिड़का गया था, हर जगह पताकाएँ लगी थीं, और प्रवेश द्वारों को समारोह के लिए सजाया गया था। नागरिक खुश थे, और नगरी वैदिक भजनों के उच्चारण से गूंज रही थी।   |   bhagavat अध्याय 10.50: कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 50: कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  10.50.37-38 
शङ्खदुन्दुभयो नेदुर्भेरीतूर्याण्यनेकश: ।
वीणावेणुमृदङ्गानि पुरं प्रविशति प्रभौ ॥ ३७ ॥
सिक्तमार्गां हृष्टजनां पताकाभिरभ्यलङ्कृताम् ।
निर्घुष्टां ब्रह्मघोषेण कौतुकाबद्धतोरणाम् ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
ज्यों ही भगवान नगरी में प्रवेश कर रहे थे, शंख और दुन्दुभियाँ बजने लगीं और कई ढोल, तुरहियाँ, वीणा, वंशी और मृदंग एक साथ बजने लगे। रास्तों पर पानी छिड़का गया था, हर जगह पताकाएँ लगी थीं, और प्रवेश द्वारों को समारोह के लिए सजाया गया था। नागरिक खुश थे, और नगरी वैदिक भजनों के उच्चारण से गूंज रही थी।
 
As the Lord entered the city, conches and drums were blown and many drums, trumpets, harps, flutes and mridangas were played simultaneously. The roads were sprinkled with water, flags were hung everywhere and the entrances were decorated for the ceremony. Its citizens were excited and the city resounded with the recitation of Vedic hymns.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)