श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 50: कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  10.50.3 
स तदप्रियमाकर्ण्य शोकामर्षयुतो नृप ।
अयादवीं महीं कर्तुं चक्रे परममुद्यमम् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा, यह अप्रिय समाचार सुनकर जरासंध दुःख और क्रोध से भर उठा और उसने पृथ्वी को यादवों से रहित करने के हर संभव प्रयास आरंभ कर दिए।
 
हे राजा, यह अप्रिय समाचार सुनकर जरासंध दुःख और क्रोध से भर उठा और उसने पृथ्वी को यादवों से रहित करने के हर संभव प्रयास आरंभ कर दिए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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