श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 50: कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  10.50.22 
हरि: परानीकपयोमुचां मुहु:
शिलीमुखात्युल्बणवर्षपीडितम् ।
स्वसैन्यमालोक्य सुरासुरार्चितं
व्यस्फूर्जयच्छार्ङ्गशरासनोत्तमम् ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
चारो ओर बादलों के सदृश विशाल शत्रु सेना के बाणों की भयावह और अथक वर्षा से अपनी सेना को पीड़ित देखकर प्रभु हरि ने अपने उत्तम धनुष शार्ङ्ग को टंकारा, जिसकी पूजा देवता और असुर दोनों करते हैं।
 
चारो ओर बादलों के सदृश विशाल शत्रु सेना के बाणों की भयावह और अथक वर्षा से अपनी सेना को पीड़ित देखकर प्रभु हरि ने अपने उत्तम धनुष शार्ङ्ग को टंकारा, जिसकी पूजा देवता और असुर दोनों करते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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