श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 50: कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  10.50.21 
सुपर्णतालध्वजचिह्नितौ रथा-
वलक्षयन्त्यो हरिरामयोर्मृधे ।
स्‍त्रिय: पुराट्टालकहर्म्यगोपुरं
समाश्रिता: सम्मुमुहु: शुचार्दिता: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
स्त्रियाँ अटारियों, महलों और नगर के ऊँचे द्वारों पर खड़ी हुई थीं। जब उन्हें श्रीकृष्ण और बलराम के रथ नहीं दिखाई पड़े, जिनकी पहचान गरुड़ और ताड़ के वृक्ष के प्रतीकों से चिन्हित पताकाओं से होती थी, तब वे दुःख से भर गईं और मूर्छित हो गईं।
 
स्त्रियाँ अटारियों, महलों और नगर के ऊँचे द्वारों पर खड़ी हुई थीं। जब उन्हें श्रीकृष्ण और बलराम के रथ नहीं दिखाई पड़े, जिनकी पहचान गरुड़ और ताड़ के वृक्ष के प्रतीकों से चिन्हित पताकाओं से होती थी, तब वे दुःख से भर गईं और मूर्छित हो गईं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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