श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 49: अक्रूर का हस्तिनापुर जाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  10.49.28 
ईश्वरस्य विधिं को नु विधुनोत्यन्यथा पुमान् ।
भूमेर्भारावताराय योऽवतीर्णो यदो: कुले ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान के आदेशों का उल्लंघन कौन कर सकता है, जो पृथ्वी के भार को कम करने के लिए यदुवंश में अवतरित हुए हैं?
 
Who can violate the orders of the Lord, who has now incarnated in the Yadu dynasty to reduce the burden on the earth?
तात्पर्य
स्वाभाविक ही, हम धृतराष्ट्र से पूछताछ करना चाहेंगे कि, "यदि तुम सब कुछ जानते हो तो उचित व्यवहार क्यों नहीं करते?" बेशक, धृतराष्ट्र का यही मुद्दा है: उनको लगता है कि चूँकि घटनाएँ पहले ही फलित हो चुकी हैं, इसलिए उनको बदलना उनके वश में नहीं है। वास्तव में, घटनाएँ उनके मोह और पापपूर्ण प्रवृत्तियों द्वारा ही घटित की गई हैं और इसलिए उनको अपने कृत्यों की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए थी। भगवान कृष्ण ने भगवद्-गीता (5.15) में स्पष्ट रूप से कहा है: नादत्ते कस्यचित् पापम्: "परम भगवान किसी के पापपूर्ण कार्यो की ज़िम्मेदारी नहीं लेते।" यह दावा करना एक खतरनाक नीति है कि हम "भाग्य" या "नियति" के कारण अनुचित व्यवहार कर रहे हैं। हमें कृष्ण चेतना को गंभीरता से उठाना चाहिए और स्वयं और अपने सहयोगियों के लिए एक शुभ भविष्य का निर्माण करना चाहिए।

अंततः, कोई यह तर्क दे सकता है कि आखिरकार, धृतराष्ट्र भगवान के लीलाओं में शामिल हैं और वास्तव में उनके शाश्वत साथी हैं। इसके उत्तर में, हम कह सकते हैं कि भगवान की लीलाएँ केवल मनोरंजक ही नहीं बल्कि उपदेशात्मक भी हैं, और यहाँ सबक यह है कि धृतराष्ट्र को उचित व्यवहार करना चाहिए। यही वह शिक्षा है जिसे भगवान देना चाहते थे। धृतराष्ट्र का दावा है कि पृथ्वी के बोझ को दूर करने के लिए कृष्ण आए थे, लेकिन पृथ्वी का बोझ तो उसके निवासियों का गलत व्यवहार है। तो, आइए उस सबक को लें जिसे भगवान यहाँ देना चाहते हैं और अपने लाभ के लिए शिक्षित हों।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)