श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 49: अक्रूर का हस्तिनापुर जाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  10.49.23 
पुष्णाति यानधर्मेण स्वबुद्ध्या तमपण्डितम् ।
तेऽकृतार्थं प्रहिण्वन्ति प्राणा राय: सुतादय: ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
मूर्ख व्यक्ति अपने जीवन, सम्पत्ति तथा सन्तान एवं अन्य सम्बन्धियों का भरण-पोषण करने के लिए पाप-कर्म में ही लगा रहता है क्योंकि वह सोचता है कि “ये वस्तुएँ मेरी हैं और इन्हें बनाए रखना मेरा धर्म है।” परन्तु अंत में ये वस्तुएँ सभी उसे छोड़कर चली जाती हैं, जिससे वह निराश हो जाता है।
 
A foolish person indulges in sinful activities to maintain his life, property, children and other relatives because he thinks, “These things are mine.” But in the end these very things leave him in a frustrated state.
तात्पर्य
इन श्लोकों में अक्रूर धृतराष्ट्र को सटीक सलाह दे रहे हैं। महाभारत की कथा जानने वालों को अहसास होगा कि ये निर्देश कितने प्रासंगिक और भविष्यवाणी करने वाले हैं, और धृतराष्ट्र को इन्हें न स्वीकारने पर कितना दुख उठाना पड़ा। हालांकि व्यक्ति अपनी संपत्ति से जुड़कर रहता है, पर अंत में सब कुछ खत्म हो जाता है, और भूल भरी आत्मा को जन्म और मृत्यु के चक्के में घुमाया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)