श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 47: भ्रमर गीत  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  10.47.9-10 
इति गोप्यो हि गोविन्दे गतवाक्‍कायमानसा: ।
कृष्णदूते समायाते उद्धवे त्यक्तलौकिका: ॥ ९ ॥
गायन्त्य: प्रियकर्माणि रुदन्त्यश्च गतह्रिय: ।
तस्य संस्मृत्य संस्मृत्य यानि कैशोरबाल्ययो: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
ऐसे बोलते हुए गोपियाँ, जिनके शब्द, शरीर और मन पूरी तरह से भगवान गोविंद के प्रति समर्पित थे, ने अब तक अपने सभी नियमित कार्यों को रोक दिया था क्योंकि अब कृष्ण के दूत, श्री उद्धव उनके बीच आ गए थे। अपने प्रिय कृष्ण के बचपन और युवावस्था में की गई लीलाओं को लगातार याद करके, उन्होंने उनके बारे में गाया और बिना किसी शर्म के रोने लगीं।
 
Thus speaking, the gopis, whose words, body and mind were completely devoted to Lord Govind, stopped doing their daily chores because now Krishna's messenger Sri Uddhava had come among them. They started praising their beloved Krishna by remembering his childhood and adolescence pastimes incessantly and without any shame started crying profusely.
तात्पर्य
यहाँ बालायाम् शब्द यह इंगित करता है कि अपने बचपन से ही, गोपियाँ कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह से पागल थीं। इसलिए, भले ही सामाजिक प्रथाएँ उन्हें अपना प्यार दूसरों को न बताने का हुकुम देती थीं, वे उन सभी बाहरी विचारों को भूल गईं और कृष्ण के दूत, उद्धव के सामने खुले तौर पर रो पड़ीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)