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bhagavat 10.47.44: क्या वह दशरथ वंशज फिर से यहाँ आएगा और अपने अंगों के स्पर्श से उन सभी को फिर से जीवनदान देगा जो अब उसी के द्वारा उत्पन्न किए गए शोक से जल रहे हैं? क्या वह हमें उसी प्रकार बचाएगा जिस प्रकार भगवान इंद्र जल धारण करने वाले बादलों से जंगल को फिर से जीवन देते हैं?   |   bhagavat अध्याय 10.47: भ्रमर गीत   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 47: भ्रमर गीत  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  10.47.44 
अप्येष्यतीह दाशार्हस्तप्ता: स्वकृतया शुचा ।
सञ्जीवयन् नु नो गात्रैर्यथेन्द्रो वनमम्बुदै: ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
क्या वह दशरथ वंशज फिर से यहाँ आएगा और अपने अंगों के स्पर्श से उन सभी को फिर से जीवनदान देगा जो अब उसी के द्वारा उत्पन्न किए गए शोक से जल रहे हैं? क्या वह हमें उसी प्रकार बचाएगा जिस प्रकार भगवान इंद्र जल धारण करने वाले बादलों से जंगल को फिर से जीवन देते हैं?
 
Will that descendant of Dasharha come here again and revive with the touch of his limbs all those who are now burning with the grief caused by him? Will he save us in the same way as Lord Indra gives life back to the forest with the water-bearing clouds?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)