श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 47: भ्रमर गीत  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  10.47.40 
कच्चिद् गदाग्रज: सौम्य करोति पुरयोषिताम् ।
प्रीतिं न: स्‍निग्धसव्रीडहासोदारेक्षणार्चित: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
उद्धव, क्या गद का बड़ा भाई अब नगर वासियों को वो आनंद दे रहा है जो वास्तव में हमारा है? हम समझते हैं कि वो स्त्रियां उदार दृश्यों के साथ-साथ प्यार भरी शर्मीली मुस्कानों से उसकी पूजा करती होंगी।
 
O noble Uddhava, is the elder brother of Gad providing the women of the city with the pleasure that is truly ours? We think those women must be worshipping him with kind glances and sweet shy smiles.
तात्पर्य
गदाग्रज नाम कृष्ण का वाचक है, जो देवरक्षित की प्रथम संतान गदा का ज्येष्ठ भ्राता (अग्रज) था। वह देवकी की बहन थी जिसका विवाह वसुदेव से हुआ था। इस प्रकार से गोपियों द्वारा कृष्ण को संबोधित करने का तात्पर्य यह था कि वह अब खुद को देवकी के पुत्र के रूप में देख रहा था। इसका आशय यह था कि वृंदावन के प्रति उसका जुड़ाव अब कम हो चुका था। अत्यधिक प्रेम के कारण, गोपियाँ क्षण भर के लिए भी कृष्ण के बारे में सोचना बंद नहीं कर पाती थीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)