श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 47: भ्रमर गीत  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  10.47.34 
यत्त्वहं भवतीनां वै दूरे वर्ते प्रियो द‍ृशाम् ।
मनस: सन्निकर्षार्थं मदनुध्यानकाम्यया ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
किंतु असल कारण यह है कि मैं तुम्हारे दृष्टि का आराध्य और प्यारा वस्तु हूँ, फिर भी मैं तुमसे बहुत दूर हूँ क्योंकि मैं तुम लोगों के मन में अपने लिए प्रगाढ़ चिंतन को प्रज्वलित करना चाहता हूँ और इस तरह तुम्हारे मनों को अपने अधिक निकट लाना चाहता हूँ।
 
But the real reason why I, the darling of your eyes, have been staying so far away from you is that I wanted to strengthen your thoughts about Me and thus bring your minds closer to Me.
तात्पर्य
कभी-कभी जो हमारी आँखों के करीब होता है वह हमारे दिल और दिमाग से बहुत दूर होता है, और इसके विपरीत दूरी दिल को और अधिक प्रिय बना देती है। यद्यपि गोपियों से दूर जाने के बाद, भगवान कृष्ण उन्हें आध्यात्मिक स्तर पर अपने निकट ला रहे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)