श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 47: भ्रमर गीत  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  10.47.33 
एतदन्त: समाम्नायो योग: साङ्ख्यं मनीषिणाम् ।
त्यागस्तपो दम: सत्यं समुद्रान्ता इवापगा: ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान विद्वानों की राय में, सभी वेदों, योग अभ्यासों, सांख्य दर्शन, त्याग, तपस्या, इंद्रियों पर नियंत्रण और ईमानदारी का यही सर्वोच्च निष्कर्ष है, जैसे कि सभी नदियों की अंतिम मंज़िल समुद्र है।
 
According to wise and authoritative people, this is the ultimate conclusion of all the Vedas and Yoga practice, Sankhya, renunciation, austerity, sensory control and truth, just as the ultimate destination of all rivers is the ocean.
तात्पर्य
यहां भगवान कहते हैं कि वेद साहित्य का अंतिम उद्देश्य आत्मा को मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने और उन्हें आध्यात्मिक आत्म-साक्षात्कार में स्थिर करने के बिंदु पर लाना है। इस प्रकार तथाकथित योग, रहस्यवाद या धर्म की प्रक्रियाएं जिसमें अप्रतिबंधित इंद्रिय संतुष्टि शामिल है, वास्तव में आध्यात्मिक प्रक्रियाएं नहीं हैं, बल्कि मूर्ख लोगों के लिए अपने पशुवत व्यवहार को उचित ठहराने के सुविधाजनक तरीके हैं।

भगवान कृष्ण यहां गोपियों को आश्वासन देते हैं कि अपने मन को आत्म-साक्षात्कार में स्थिर करने से, वे भगवान के साथ अपनी आध्यात्मिक एकता का एहसास करेंगे। इस प्रकार उन्हें अब आगे पृथक्‍करण की पीड़ा नहीं होगी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)