श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 47: भ्रमर गीत  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  10.47.26 
दिष्‍ट्या पुत्रान्पतीन्देहान् स्वजनान्भवनानि च ।
हित्वावृणीत यूयं यत् कृष्णाख्यं पुरुषं परम् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
सौभाग्य से, आप लोगों ने अपने पुत्रों, पतियों, सांसारिक सुखों, रिश्तेदारों और घरों को उस परम पुरुष के लिए त्याग दिया है, जिसे कृष्ण के नाम से जाना जाता है।
 
Fortunately, you have abandoned your sons, husbands, bodily comforts, relatives and homes for the sake of the Supreme Being who is known by the name of Krsna.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती समझाते हैं, कि गोपियों ने इन वस्तुओं के प्रति अपने मालिकाना हक को त्याग दिया था। इतिहास से पता चलता है, कि गोपियाँ वृन्दावन में ही रहीं और परिवार के साथ अपने घरों में रह रही थीं। परन्तु, साधारण लोगों के विपरीत, उन्होंने पुत्रों, पतियों इत्यादि के प्रति सम्पूर्ण रूप से 'अहंकारी' स्वामित्व भाव को त्याग दिया। उन्होंने कभी भी उनका उपभोग करने की कोशिश नहीं की अपितु संसार के महान धार्मिक शास्त्रों में जिस प्रकार अनुशंसा की जाती है, अपना पूरा हृदय और चित्त परम प्रभु को समर्पित कर दिया। गोपियों के उदाहरण का अनुसरण करते हुए, हमें परम प्रभु से पूरे हृदय, आत्मा और शक्ति से प्रेम करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)