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bhagavat 10.46.2: सर्वशक्तिमान प्रभु हरि, जो अपने भक्तों के सभी कष्टों को दूर करते हैं, ने एक बार अपने पूर्ण रूप से समर्पित, प्रिय मित्र उद्धव का हाथ अपने हाथ में लेकर उनसे इस प्रकार कहा।   |   bhagavat अध्याय 10.46: उद्धव की वृन्दावन यात्रा   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 46: उद्धव की वृन्दावन यात्रा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  10.46.2 
तमाह भगवान्प्रेष्ठं भक्तमेकान्तिनं क्व‍‍चित् ।
गृहीत्वा पाणिना पाणिं प्रपन्नार्तिहरो हरि: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
सर्वशक्तिमान प्रभु हरि, जो अपने भक्तों के सभी कष्टों को दूर करते हैं, ने एक बार अपने पूर्ण रूप से समर्पित, प्रिय मित्र उद्धव का हाथ अपने हाथ में लेकर उनसे इस प्रकार कहा।
 
Lord Hari, who removes all the troubles of those who surrender to him, once took the hand of his devotee and dearest friend Uddhava in his hand and spoke to him as follows.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)