श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 45: कृष्ण द्वारा अपने गुरु-पुत्र की रक्षा  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  10.45.9 
तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयो: ।
अकुर्वतोर्वां शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदा भृशम् ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
प्रिय पिताजी और माताजी, आप हम दोनों को आपकी सेवा न कर पाने के लिए क्षमा कर दें। हम स्वतंत्र नहीं थे और क्रूर कंस द्वारा अत्यधिक परेशान किए गए थे।
 
O father and mother, please forgive us for not being able to serve you. We were not free and were greatly tormented by the cruel Kamsa.
तात्पर्य
संस्कृत व्याकरण के अनुसार, पर-तंत्रयोः और क्लिष्टयोः शब्द वासुदेव और देवकी को भी दर्शा सकते हैं। दरअसल, वासुदेव और देवकी विधाता के नियंत्रण में थे और कंस के कृत्यों से परेशान थे, जबकि श्रीकृष्ण हमेशा ही भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)