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bhagavat 10.45.41: सागर ने कहा, “निस्संदेह उसी दैत्य ने उस बालक को उठा लिया है।” यह सुनकर भगवान कृष्ण समुद्र में घुस गए, पंचजन को खोज निकाला और उसे मार डाला। लेकिन भगवान को उस दैत्य के पेट के अंदर वह बालक नहीं मिला।   |   bhagavat अध्याय 10.45: कृष्ण द्वारा अपने गुरु-पुत्र की रक्षा   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 45: कृष्ण द्वारा अपने गुरु-पुत्र की रक्षा  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  10.45.41 
आस्ते तेनाहृतो नूनं तच्छ्रुत्वा सत्वरं प्रभु: ।
जलमाविश्य तं हत्वा नापश्यदुदरेऽर्भकम् ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
सागर ने कहा, “निस्संदेह उसी दैत्य ने उस बालक को उठा लिया है।” यह सुनकर भगवान कृष्ण समुद्र में घुस गए, पंचजन को खोज निकाला और उसे मार डाला। लेकिन भगवान को उस दैत्य के पेट के अंदर वह बालक नहीं मिला।
 
The ocean said, “That demon has undoubtedly stolen the child.” Hearing this, Lord Krishna entered the ocean, found Panchajana and killed him. But the Lord did not find the child inside the demon’s stomach.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)