श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 45: कृष्ण द्वारा अपने गुरु-पुत्र की रक्षा  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  10.45.38 
तथेत्यथारुह्य महारथौ रथं
प्रभासमासाद्य दुरन्तविक्रमौ ।
वेलामुपव्रज्य निषीदतु: क्षणं
सिन्धुर्विदित्वार्हणमाहरत्तयो: ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
"बहुत अच्छा," ऐसा वे दोनों असीम पराक्रम वाले महारथियों ने उत्तर दिया और तत्काल ही अपने रथ पर सवार होकर वे प्रभास की ओर रवाना हो गए। जब वे उस स्थान पर पहुँचे तो वे समुद्र तट तक पैदल गए और वहाँ बैठ गए। एक पल में ही समुद्र के देवता ने उन्हें परमेश्वर के रूप में पहचान लिया और श्रद्धा-रूप में अपनी भेंट लेकर उनके पास आए।
 
The two warriors of infinite prowess replied, “Very well,” and immediately mounted their chariots and left for Prabhas. When they reached that place, they walked to the seashore and sat down. In a moment, the god of the sea recognized them as the Lord and came to them with a tribute of respect.
तात्पर्य
पश्चिमी विद्वान कभी-कभी सोचते हैं कि समुद्र के देव, सूर्य के देव आदि को प्राचीन बुद्धि की पुस्तकों में संदर्भित करना सोचने के आदिम, पौराणिक ढंग को प्रकट करता है। वे कभी-कभी कहते हैं कि आदिम मनुष्य यह सोचते हैं कि समुद्र देव है या सूर्य और चंद्र देव हैं। वास्तव में इस पद में सिंधु जैसे शब्द जिसका अर्थ "समुद्र" है, का संदर्भ प्रकृति के भौतिक पहलू पर शासन करने वाले व्यक्ति को इंगित करता है।

हम कई आधुनिक उदाहरण दे सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र में हम कह सकते हैं, "संयुक्त राज्य अमेरिका 'हां' वोट करता है, सोवियत संघ 'नहीं' में मतदान करता है।" हमारे कहने का मतलब मुश्किल से यह है कि वहाँ के भौतिक देशों या भवनों ने मतदान किया है। हमारा मतलब है कि उस राजनीतिक और भौगोलिक इकाई का प्रतिनिधित्व करने वाले एक विशेष व्यक्ति ने मतदान किया है। फिर भी समाचार पत्र केवल यही कहेंगे, "संयुक्त राज्य अमेरिका ने मतदान किया, निर्णय लिया आदि।" और हर कोई जानता है इसका क्या मतलब है।

इसी तरह, व्यवसाय में हम कह सकते हैं, "एक बड़े समूह ने एक छोटी फर्म को निगल लिया है।" हमारा मतलब मुश्किल से यह है कि भवनों, कार्यालय उपकरण और इस तरह से उस भवन को शारीरिक रूप से निगल लिया गया है जो श्रमिकों और कार्यालय के उपकरणों से भरा हुआ है। हमारा मतलब है कि अधिकृत अधिकारियों ने अपनी संबंधित कॉर्पोरेट इकाइयों की ओर से एक विशेष कार्य किया है।

दुर्भाग्य से, आधुनिक विद्वान अपने पालतू सिद्धांतों की पुष्टि करने के लिए उत्सुक हैं कि प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान आदिम, मिथकीय है और बड़े पैमाने पर सोचने के आधुनिक तरीकों से, जो उनकी अपनी वाक्पटु टिप्पणियों द्वारा उदाहरणित है। हालाँकि, आधुनिक विद्वता में बहुत कुछ कृष्ण चेतना के प्रकाश में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)