श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 45: कृष्ण द्वारा अपने गुरु-पुत्र की रक्षा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  10.45.13 
आह चास्मान् महाराज प्रजाश्चाज्ञप्तुमर्हसि ।
ययातिशापाद् यदुभिर्नासितव्यं नृपासने ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने उनसे कहा, हे महाबली महाराज, हम आपकी प्रजा हैं, अत: आप हमें आदेश दें। सचमुच, ययाति के शाप के कारण कोई भी यदुवंशी राजसिंहासन पर नहीं बैठ सकता।
 
The Lord said to him: O King, we are your subjects, so you give us orders. Actually, due to the curse of Yayati, no Yaduvanshi can sit on the throne.
तात्पर्य
यह संभव है कि उग्रसेन ने प्रभु से कहा होगा, "हे मेरे प्रभु, वास्तव में तो सिंहासन पर बैठने वाला आप ही होना चाहिए।" इस कथन को जानकर भगवान कृष्ण ने उग्रसेन से कहा कि ययाति के प्राचीन श्राप के कारण तकनीकी तौर पर यादव वंश के राजकुमार शाही सिंहासन पर नहीं बैठ सकते हैं, इसलिए कृष्ण और बलराम इसके लिए अयोग्य थे। ज़ाहिर है, उग्रसेन को भी यादव वंश का हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन प्रभु के आदेश से वह शाही सिंहासन पर बैठ सकते थे। निष्कर्ष यह है, ये सब लीलाएं थीं जो परम प्रभु ने मानव रूप में धारण करके आनंद उठाई थीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)