श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 42: यज्ञ के धनुष का टूटना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  10.42.14 
तद्दर्शनस्मरक्षोभादात्मानं नाविदन् स्त्रिय: ।
विस्रस्तवास:कवरवलया लेख्यमूर्तय: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण के दर्शन से नगर की नारियाँ कामदेव के वशीभूत हो उठीं। इस तरह उत्तेजित होकर वे अपना होश खो बैठीं। उनके कपड़े, चोटियाँ और कंगन बिखर गए, और वे एक तस्वीर में बनी आकृतियों की तरह जमी हुई खड़ी रहीं।
 
The sight of Krishna aroused Kaamdev (love and affection) in the hearts of the women of the city. Thus agitated, they lost their senses. Their clothes, locks and bracelets would become loose and they would stand stunned like the figures in the painting.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि चूंकि मथुरा की महिलाओं ने कृष्ण को देखते ही तुरंत संयोग के लक्षण अनुभव किए, वे नगर के सबसे उन्नत भक्त थे। कामदेव के दस प्रभावों का वर्णन इस प्रकार है: चक्षु-रागः प्रथमं चित्तासंगस्ततो'थ संकल्पः निद्रा-च्छेदस्तनुता विषय-निवृत्तिस् त्रपा-नसः/ उन्मादो मूर्च्छा मृतिरित्येताः स्मर-दशा दशैव स्युः। "पहले आँखों से व्यक्त होने वाला आकर्षण आता है, फिर मन में तीव्र लगाव, फिर दृढ़ संकल्प, नींद का नष्ट होना, दुबला-पतला होना, बाहरी चीजों में अरुचि, बेशर्मी, पागलपन, स्तब्ध होना और मृत्यु। ये कामदेव के प्रभाव के दस चरण हैं।"

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती यह भी बताते हैं कि जिन भक्तों में ईश्वर के लिए शुद्ध प्रेम होता है, वे आमतौर पर मृत्यु का लक्षण नहीं दिखाते हैं, क्योंकि यह कृष्ण के संबंध में अशुभ है। यद्यपि, वे अन्य नौ लक्षणों को प्रकट करते हैं, जो अंततः परमानंद में स्तब्ध होकर समाप्त होते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)