श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 41: कृष्ण तथा बलराम का मथुरा में प्रवेश  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  10.41.40 
ततस्तु वायक: प्रीतस्तयोर्वेषमकल्पयत् ।
विचित्रवर्णैश्चैलेयैराकल्पैरनुरूपत: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
तदनंतर, एक बुनकर आया और प्रभुओं के लिए स्नेह से भरकर विविध रंग-बिरंगे कपड़ों से उनकी वेशभूषा को सजाया।
 
Thereafter a weaver came and, moved by affection for both the dignitaries, he adorned their costumes with clothes and jewellery of various colours.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी इस प्रकार व्याख्या करते हैं कि वस्त्रकार ने प्रभुओं को आभूषणों जैसे आभासित होने वाले वस्त्रों की बाहों के कंगनों ओर कुंडलों से सजाया। अनुरूपतः शब्द का अर्थ है कि रंगों का एक दूसरे से सुंदर मिलान था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)