श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 41: कृष्ण तथा बलराम का मथुरा में प्रवेश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.41.1 
श्रीशुक उवाच
स्तुवतस्तस्य भगवान् दर्शयित्वा जले वपु: ।
भूय: समाहरत् कृष्णो नटो नाट्यमिवात्मन: ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अक्रूर के स्तुति करने से पहले ही भगवान श्री कृष्ण ने जल में प्रकट किया हुआ अपना वह रूप छिपा लिया, जैसे कोई नाटक का पात्र अपना खेल पूरा कर लेता है।
 
Sukadeva Goswami said: While Akrura was still praising God, Lord Krishna hid His form, which He had revealed in the water, just as an acrobat finishes his show.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण ने आकू्र की दृष्टि के सामने से विष्णू रूप के साथ साथ आध्यात्मिक आकाश और उसके शाश्वत निवासियों के दर्शन वापस ले लिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)