श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 40: अक्रूर द्वारा स्तुति  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  10.40.15 
त्वय्यव्ययात्मन् पुरुषे प्रकल्पिता
लोका: सपाला बहुजीवसङ्कुला: ।
यथा जले सञ्जिहते जलौकसो-
ऽप्युदुम्बरे वा मशका मनोमये ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
मन और इंद्रियों पर आधारित यह सृष्टि, जिनमें असंख्य जीव और उनकी अधिष्ठात्री देवताएँ हैं, आपसे, अविनाशी परमेश्वर से ही उत्पन्न हुई है। ये जगत आपके भीतर घूमते रहते हैं, जैसे जलचर समुद्र में तैरते हैं या छोटे-छोटे कीड़े एटमर के फल में छेद करते रहते हैं।
 
मन और इंद्रियों पर आधारित यह सृष्टि, जिनमें असंख्य जीव और उनकी अधिष्ठात्री देवताएँ हैं, आपसे, अविनाशी परमेश्वर से ही उत्पन्न हुई है। ये जगत आपके भीतर घूमते रहते हैं, जैसे जलचर समुद्र में तैरते हैं या छोटे-छोटे कीड़े एटमर के फल में छेद करते रहते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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