श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 35: कृष्ण के वनविहार के समय गोपियों द्वारा कृष्ण का गायन  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  10.35.20-21 
कुन्ददामकृतकौतुकवेषो
गोपगोधनवृतो यमुनायाम् ।
नन्दसूनुरनघे तव वत्सो
नर्मद: प्रणयिणां विजहार ॥ २० ॥
मन्दवायुरुपवात्यनुकूलं
मानयन् मलयजस्पर्शेन ।
वन्दिनस्तमुपदेवगणा ये
वाद्यगीतबलिभि: परिवव्रु: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
हे निर्दोष यशोदा, तुम्हारा प्यारा नन्दलाल, महाराज नंदा के पुत्र, ने चमेली की माला से अपना अनोखा परिधान सजाया हुआ है, और इस समय वो यमुना के किनारे, गायों और ग्वालों के साथ अपने प्यारे दोस्तों का मनोरंजन करते हुए खेल रहा है। कोमल हवा अपनी सुखद चंदन की खुशबू से उसका सम्मान कर रही है, और तरह-तरह के उपदेवता चारों तरफ बंदियों की तरह खड़े होकर अपनी संगीत, गाना और श्रद्धा के तोहफे अर्पित कर रहे हैं।
 
O sinless Yashoda, your beloved Nandanandana has adorned himself with garlands of jasmine and is now playing with the cows and cowherd boys on the banks of the Yamuna, entertaining his dear companions. The gentle breeze is honoring him with its pleasant sandalwood fragrance and various demigods are standing around like captives, offering their music, songs and gifts of devotion.
तात्पर्य
श्रील जीव गोस्वामी समझाते हैं कि गोपियां फिर से व्रज की रानी माता यशोदा के आँगन में हैं। वे कृष्ण के गोवंश चराने और खेलने के बाद वृंदावन लौटने का वर्णन करके उन्हें प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही हैं।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती टिप्पणी करते हैं कि यहाँ वर्णित छोटे देवता उपदेव, गंधर्वों को शामिल करते हैं, जो अपने दिव्य संगीत और नृत्य के लिए प्रसिद्ध हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)