श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 35: कृष्ण के वनविहार के समय गोपियों द्वारा कृष्ण का गायन  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  10.35.16-17 
निजपदाब्जदलैर्ध्वजवज्र-
नीरजाङ्कुशविचित्रललामै: ।
व्रजभुव: शमयन् खुरतोदं
वर्ष्मधुर्यगतिरीडितवेणु: ॥ १६ ॥
व्रजति तेन वयं सविलास-
वीक्षणार्पितमनोभववेगा: ।
कुजगतिं गमिता न विदाम:
कश्मलेन कवरं वसनं वा ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
जब कृष्ण कमल पंखुड़ी सदृश अपने चरणों से व्रज में भ्रमण करते हैं और भूमि पर पताका, वज्र, कमल तथा अंकुश जैसे स्पष्ट चिह्न बनते हैं, तो वे पृथ्वी को गायों के खुरों के कारण हुए कष्ट को कम करते हैं। जब वे अपनी विख्यात बाँसुरी बजाते हैं, तो हाथी की अदा पर झूमते हैं। इस तरह हम गोपियाँ, जो कृष्ण की विनोदप्रिय दृष्टि के कारण कामदेव से चंचल हो उठती हैं, वृक्ष की तरह स्थिर खड़ी रह जाती हैं और अपने ढीले हुए बालों तथा वस्त्रों की सुध भी नहीं रहती।
 
जब कृष्ण कमल पंखुड़ी सदृश अपने चरणों से व्रज में भ्रमण करते हैं और भूमि पर पताका, वज्र, कमल तथा अंकुश जैसे स्पष्ट चिह्न बनते हैं, तो वे पृथ्वी को गायों के खुरों के कारण हुए कष्ट को कम करते हैं। जब वे अपनी विख्यात बाँसुरी बजाते हैं, तो हाथी की अदा पर झूमते हैं। इस तरह हम गोपियाँ, जो कृष्ण की विनोदप्रिय दृष्टि के कारण कामदेव से चंचल हो उठती हैं, वृक्ष की तरह स्थिर खड़ी रह जाती हैं और अपने ढीले हुए बालों तथा वस्त्रों की सुध भी नहीं रहती।
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas