श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 35: कृष्ण के वनविहार के समय गोपियों द्वारा कृष्ण का गायन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  10.35.1 
श्रीशुक उवाच
गोप्य: कृष्णे वनं याते तमनुद्रुतचेतस: ।
कृष्णलीला: प्रगायन्त्यो निन्युर्दु:खेन वासरान् ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: जब भी कृष्ण वन को जाते थे तो गोपियों के मन उनके पीछे-पीछे चलते थे और इस प्रकार युवतियाँ दुखी मन से उनके लीलाओं के गीत गाती हुई अपना दिन बिताती थीं।
 
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: जब भी कृष्ण वन को जाते थे तो गोपियों के मन उनके पीछे-पीछे चलते थे और इस प्रकार युवतियाँ दुखी मन से उनके लीलाओं के गीत गाती हुई अपना दिन बिताती थीं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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