श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 34: नन्द महाराज की रक्षा तथा शंखचूड़ का वध  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  10.34.9 
स वै भगवत: श्रीमत्पादस्पर्शहताशुभ: ।
भेजे सर्पवपुर्हित्वा रूपं विद्याधरार्चितम् ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान के दिव्य चरणों के स्पर्श से साँप के सारे पाप धुल गए और उसने अपना साँप वाला शरीर त्याग दिया। वह एक पूजनीय विद्याधर की छवि में अवतरित हुआ।
 
As soon as the snake touched the divine feet of the Lord, all his sins were destroyed and he left his snake body. He appeared in the form of Pujya Vidyadhar.
तात्पर्य
रूपां विद्याधरार्चितम् शब्द दर्शाता है कि पहले सर्प विद्याधर नामक देवताओं में पूजनीय एक सुंदर रूप में प्रकट हुआ था। दूसरे शब्दों में, वह विद्याधरों के नेता के रूप में प्रकट हुआ था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)