श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 33: रास नृत्य  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  10.33.39 
विक्रीडितं व्रजवधूभिरिदं च विष्णो:
श्रद्धान्वितोऽनुश‍ृणुयादथ वर्णयेद् य: ।
भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं
हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीर: ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
वृन्दावन की गोपियों के साथ भगवान् की क्रीड़ाओं को जो कोई भी श्रद्धा से सुनता या वर्णन करता है, वह भगवान् की शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है। इस प्रकार वह शीघ्र ही धीरजवान होकर हृदय रोग रूपी कामवासना को जीत लेता है।
 
One who listens or narrates with devotion the pastimes of the Lord with the young gopikas of Vrindavana will attain pure devotion to the Lord. In this way he will soon become patient and overcome the disease of the heart, lust.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण की संयोग लीला की असाधारण शक्ति यहाँ स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। गुणवत्तापूर्ण रूप से, भगवान के आध्यात्मिक, प्रेममय लीलाएँ भौतिक, कामुक मामलों के बिल्कुल विपरीत हैं, इतना कि भगवान की लीलाओं के बारे में सुनने मात्र से ही भक्त कामवासना पर विजय प्राप्त कर लेता है। अश्लील साहित्य पढ़ने या भौतिक प्रणय के बारे में सुनने से, हम निश्चित रूप से कामवासना पर विजय प्राप्त नहीं करते हैं बल्कि अपने वासना को ही बढ़ाते हैं। लेकिन भगवान के दाम्पत्य संबंधों के बारे में सुनना या पढ़ना ठीक उल्टा प्रभाव डालता है क्योंकि वे विपरीत प्रकृति के होते हैं, जो विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक होते हैं। इसलिए यह भगवान कृष्ण की अकारण कृपा है जो इस संसार में अपनी रास-लीला प्रदर्शित करते हैं। यदि हम इस कथन से जुड़ जाते हैं, तो हम आध्यात्मिक प्रेम के आनंद का अनुभव करेंगे और इस प्रकार उस प्रेम के विकृत प्रतिबिंब को अस्वीकार कर देंगे, जिसे वासना कहा जाता है। जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (2.59) में अच्छी तरह से कहा है, परं दृष्ट्वा निवर्तते: "एक बार परम को सीधे अनुभव करने के बाद, कोई भौतिक सुखों में नहीं लौटता।"
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत तैंतीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)