श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 33: रास नृत्य  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  10.33.32 
कुशलाचरितेनैषामिह स्वार्थो न विद्यते ।
विपर्ययेण वानर्थो निरहङ्कारिणां प्रभो ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, जब ये महान लोग मिथ्या अहंकार से रहित होकर इस संसार में पवित्र कर्म करते हैं, तो उसमें उनका कोई स्वार्थ नहीं होता और जब वे ऊपरी तौर पर पवित्रता के नियमों के विपरीत प्रतीत होने वाले कर्म (अनर्थ) भी करते हैं, तो भी उन्हें पापों का फल नहीं मिलता।
 
O Lord, when these great persons, free from false ego, act with purity in this world, they have no selfish motive behind it, and even when they perform actions (anartha) which appear to be against the rules of purity, they do not have to suffer the consequences of sins.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)