श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 33: रास नृत्य  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  10.33.31 
ईश्वराणां वच: सत्यं तथैवाचरितं क्‍वचित् ।
तेषां यत् स्ववचोयुक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत् ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान द्वारा शक्ति प्रदान किए गए सेवकों के कथन सदैव सत्य होते हैं और जब वे इन वचनों के अनुरूप कर्म करते हैं, तो वे आदर्श होते हैं। अतः जो विवेकशील है, उसे उनके आदेशों का पालन करना चाहिए।
 
The words of the servants empowered by God are always true and when they act in accordance with these words, they are exemplary. Therefore, one who is wise should obey their orders.
तात्पर्य
ईश्वर शब्द को आमतौर पर संस्कृत शब्दकोशों में "प्रभु, स्वामी, शासक" और साथ ही "सक्षम, शक्तिशाली निष्पादन" के रूप में परिभाषित किया गया है। श्रील प्रभुपाद अक्सर ईश्वर शब्द का अनुवाद "नियंत्रक" के रूप में करते थे, जो ईश्वर की दो मूलभूत अवधारणाओं को शानदार ढंग से समाहित करता है, अर्थात् एक स्वामी या शासक और एक सक्षम या शक्तिशाली व्यक्ति। एक मालिक अक्षम हो सकता है, लेकिन एक नियंत्रक एक मालिक या स्वामी होता है जो वास्तव में चीजों को घटित करता है। परमेश्वर, सर्वोच्च ईश्वर, सर्वोच्च नियंत्रक, निश्चित रूप से ईश्वर, कृष्ण हैं, जो सभी कारणों का कारण हैं।

हालांकि सामान्य लोग, विशेष रूप से पश्चिमी देशों में, इस तथ्य से अवगत नहीं हैं, शक्तिशाली व्यक्तित्व हमारे ब्रह्मांड को नियंत्रित करते हैं। ब्रह्मांड की आधुनिक, अवैयक्तिक अवधारणा एक लगभग पूरी तरह से बेजान ब्रह्मांड को दर्शाती है जिसमें पृथ्वी अर्थहीन रूप से तैरती है। इस प्रकार हम अपने आनुवंशिक कोड को संरक्षित और पुन: उत्पन्न करने के संदिग्ध "अंतिम उद्देश्य" के साथ रह जाते हैं, जिसका अपना "अंतिम उद्देश्य" होता है जो खुद को फिर से पुन: उत्पन्न करके घटनाओं की अर्थहीन श्रृंखला में एक और कड़ी जोड़ना है।

अज्ञानी भौतिकवादियों द्वारा रचे गए इस बाँझ, अर्थहीन संसार के विपरीत, वास्तविक ब्रह्मांड जीवन से भरा हुआ है - व्यक्तिगत जीवन - और वास्तव में ईश्वर से भरा हुआ है, जो सभी का पालन-पोषण करता है और उसे धारण करता है। वास्तविकता का सार परम भगवान और उनके अनगिनत जीवों के साथ उनका व्यक्तिगत संबंध है, जिनमें से हम नमूने हैं। कुछ जीव भौतिकवाद के भ्रम, या भौतिक शरीर के साथ तादात्म्य, में फंसे हुए हैं, जबकि अन्य मुक्त हैं, अपने शाश्वत, आध्यात्मिक स्वरूप के बारे में जागरूक हैं। एक तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो अज्ञान की भौतिक स्थिति से आत्म-साक्षात्कार की प्रगति कर रहे हैं, कृष्ण चेतना की प्रबुद्ध अवस्था की ओर।

वास्तविकता अंततः व्यक्तिगत और दिव्य है, और इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि, जैसा कि वैदिक साहित्य हमें बताता है, हमारे ब्रह्मांड और अन्य ब्रह्मांडों का प्रबंधन महान व्यक्तित्वों द्वारा किया जाता है, जैसे हमारे शहर, राज्य और देश का प्रबंधन सशक्त व्यक्तित्वों द्वारा किया जाता है। जब हम लोकतांत्रिक रूप से किसी विशेष राजनेता को शासन करने का अधिकार देते हैं, तो हम उसे वोट देते हैं क्योंकि उसने कुछ ऐसा प्रदर्शित किया है जिसे हम "नेतृत्व" या "क्षमता" कहते हैं। हम सोचते हैं, "वह काम पूरा कर लेगा।" दूसरे शब्दों में, किसी व्यक्ति द्वारा शासन करने की शक्ति प्राप्त करने के बाद ही हम उसे वोट देते हैं; हमारा वोट उसे नेता नहीं बनाता है, बल्कि उस शक्ति को पहचानता है जो किसी अन्य स्रोत से आती है। इस प्रकार, जैसा कि भगवान कृष्ण भगवद गीता के दसवें अध्याय के अंत में बताते हैं, किसी भी जीव में असाधारण शक्ति, क्षमता या अधिकार का प्रदर्शन करने वाला स्वयं भगवान या भगवान की ऊर्जा द्वारा सशक्त रहा होगा।

प्रभु द्वारा सीधे सशक्त किए गए लोग उनके प्रति समर्पित होते हैं, और इस प्रकार उनकी शक्ति और प्रभाव दुनिया भर में अच्छाई फैलाते हैं, जबकि जो लोग प्रभु की मायावी शक्तियों से सशक्त होते हैं, वे कृष्ण के साथ अप्रत्यक्ष संबंध में होते हैं क्योंकि वे उनकी इच्छा को सीधे प्रतिबिंबित नहीं करते हैं। बेशक, वे परोक्ष रूप से उनकी इच्छा को प्रतिबिंबित करते हैं, क्योंकि यह कृष्ण की व्यवस्था है कि प्रकृति के नियम अज्ञानी जीवों पर कार्य करते हैं, धीरे-धीरे उन्हें अपने कई जन्मों की यात्रा के माध्यम से, सर्वोच्च प्रभु के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए राजी करते हैं। इस प्रकार जैसे-जैसे राजनीतिज्ञ उनके द्वारा अनुसरण किए जाने वाले भौतिकवादी व्यक्तियों के लिए युद्ध, झूठी आशाएँ और असंख्य भावुक योजनाएँ बनाते हैं, वैसे-वैसे राजनीतिज्ञ परोक्ष रूप से भगवान के कार्यक्रम को ईश्वरहीनता के कड़वे फल का अनुभव करने के लिए वातानुकूलित आत्माओं को अनुमति देने के लिए निष्पादित कर रहे हैं।

श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने ईश्वराणां शब्द का अनुवाद "वे जो ज्ञान और तपस्या के माध्यम से शक्तिशाली बन गए हैं" के रूप में किया है। जैसे ही कोई ईश्वर की प्रकृति और इच्छा को समझता है और आध्यात्मिक जीवन में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए आवश्यक व्यक्तिगत बलिदान देता है, सर्वोच्च प्रभु द्वारा व्यक्ति उनकी इच्छा का प्रतिनिधित्व करने के लिए सशक्त होता है, जिसे व्यक्ति ने समझदारी से पहचाना और स्वीकार किया है।

ईश्वर की सर्वोच्च हस्ती धार्मिक व्यवहार का एक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए पृथ्वी पर कृपापूर्वक अवतरित होती है। जैसे भगवान कृष्ण ने भगवद्-गीता (3.24) में कहा है, "यदि मैंने मानक कर्तव्यों का पालन नहीं किया, तो पूरा संसार भ्रमित हो जाएगा और वास्तव में नष्ट हो जाएगा।" इस प्रकार भगवान ने अपने विभिन्न अवतारों में दिखाया कि इस दुनिया में ठीक से कैसे कार्य किया जाए। एक अच्छा उदाहरण भगवान रामचंद्र हैं, जिन्होंने राजा दशरथ के पुत्र के रूप में अद्भुत व्यवहार किया।

लेकिन जब भगवान कृष्ण स्वयं उतरते हैं, तो वे परम धार्मिक सिद्धांत का भी प्रदर्शन करते हैं, अर्थात् परमेश्वर सभी अन्य जीवित प्राणियों से परे है और कोई भी उसकी सर्वोच्च स्थिति की नकल नहीं कर सकता। यह सर्वोपरि धार्मिक सिद्धांत - कि भगवान अद्वितीय हैं, बिना किसी समान या श्रेष्ठ के - गीता में गोपियों के साथ भगवान कृष्ण के स्पष्ट रूप से अनैतिक लीलाओं में प्रदर्शित किया गया था। यहाँ शुकदेव गोस्वामी द्वारा बताए अनुसार, कोई भी इन गतिविधियों की नकल किए बिना भयानक परिणामों को आमंत्रित नहीं कर सकता है। जो यह सोचता है कि भगवान कृष्ण काम के अधीन एक साधारण प्राणी हैं, या जो उनके रास नृत्य को सराहनीय मानते हैं और उनकी नकल करने की कोशिश करते हैं, निश्चित रूप से विजयी होंगे, जैसा कि इस अध्याय के पाठ 30 में वर्णित है।

अंततः, भगवान और उसके सशक्त सेवकों के बीच अंतर किया जाना चाहिए। भगवान के एक सशक्त सेवक, जैसे ब्रह्मा के मामले में, कर्म के नियम के अनुसार, पिछली गतिविधियों के अवशिष्ट प्रतिक्रियाओं का अनुभव हो सकता है। लेकिन भगवान कर्म के नियमों की किसी भी उलझन से हमेशा मुक्त हैं। वह एक अद्वितीय मंच पर हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)