श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 33: रास नृत्य  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  10.33.16 
एवं परिष्वङ्गकराभिमर्श-
स्निग्धेक्षणोद्दामविलासहासै: ।
रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभि-
र्यथार्भक: स्वप्रतिबिम्बविभ्रम: ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार भगवान कृष्ण, जो कि आदि भगवान नारायण हैं और जो कि लक्ष्मी जी के पति हैं, ने व्रज की युवतियों को गले लगाकर, उन्हें प्यार से सहलाकर और अपनी चंचल हँसी के साथ उन्हें प्यार से निहारकर उनके साथ आनंद लिया। यह बिलकुल वैसा ही था जैसे कोई बच्चा अपनी परछाई के साथ खेल रहा हो।
 
Thus, the original Lord Narayana, the husband of Lakshmi, Lord Krishna enjoyed the company of the maidens of Vraja by embracing them, caressing them and lovingly gazing at them with His slanting, playful smile. It was like a child playing with his own shadow.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर इस श्लोक पर निम्न प्रकार से टिप्पणी करते हैं: "केवल श्री कृष्ण ही सर्वोच्च परम सत्य हैं और उनकी सामर्थ्य असीमित हैं। उनकी सभी सामर्थ्य, वैयक्तिक रूप लेते हुए, भगवान कृष्ण की लीलाओं में लीन रहती हैं। जिस प्रकार उनकी एक परम दैवीय शक्ति का संपन्न प्रकटीकरण भगवान की सभी असंख्य शक्तियों को प्रकट करता है, उसी प्रकार रास नृत्य में कृष्ण ने स्वयं को उतनी ही बार प्रकट किया है जितनी कि गोपियों द्वारा प्रदर्शित विभिन्न शक्तियाँ हैं। सब कुछ कृष्ण है, लेकिन उनकी इच्छा से उनकी आध्यात्मिक शक्ति योग-माया गोपियों को प्रकट करती है। जब उनकी आंतरिक शक्ति योग-माया अपनी दिव्य भावनाओं की वृद्धि के लिए ऐसी लीलाओं का निर्माण करती है, तो यह एक युवा लड़के की तरह होता है जो अपने ही प्रतिबिंब के साथ खेल रहा होता है। लेकिन चूंकि ये लीलाएँ उनकी आध्यात्मिक शक्ति द्वारा बनाई गई हैं, इसलिए वे शाश्वत और स्व-प्रकट होती हैं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)