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श्लोक 10.32.22  |
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां
स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि व: ।
या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खला:
संवृश्च्य तद् व: प्रतियातु साधुना ॥ २२ ॥ |
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| अनुवाद |
| मैं ब्रह्मा के जीवनकाल तक भी आपकी निस्वार्थ सेवा के ऋण को चुका नहीं पाऊंगा। मेरे साथ आपका रिश्ता दोषों से परे है। आपने उन सभी पारिवारिक बंधनों को तोड़कर मेरी पूजा की है जिन्हें तोड़ना मुश्किल होता है। इसलिए आपके अपने यशस्वी कार्य ही इसकी क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। |
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| मैं ब्रह्मा के जीवनकाल तक भी आपकी निस्वार्थ सेवा के ऋण को चुका नहीं पाऊंगा। मेरे साथ आपका रिश्ता दोषों से परे है। आपने उन सभी पारिवारिक बंधनों को तोड़कर मेरी पूजा की है जिन्हें तोड़ना मुश्किल होता है। इसलिए आपके अपने यशस्वी कार्य ही इसकी क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। |
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| इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त होता है । |
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