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श्लोक 10.32.20  |
नाहं तु सख्यो भजतोऽपि जन्तून्
भजाम्यमीषामनुवृत्तिवृत्तये ।
यथाधनो लब्धधने विनष्टे
तच्चिन्तयान्यन्निभृतो न वेद ॥ २० ॥ |
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| अनुवाद |
| किन्तु हे गोपियो, मैं उन जीवों के प्रति भी तत्काल स्नेह प्रदर्शित नहीं कर पाता जो मेरी पूजा करते हैं। इसका कारण यह है कि मैं उनकी प्रेमाभक्ति को प्रगाढ़ बनाना चाहता हूँ। इससे वे ऐसे निर्धन व्यक्ति के सदृश हो जाते हैं जिसने पहले कुछ संपत्ति प्राप्त की थी किंतु बाद में उसे खो दिया है। इस तरह उसके बारे में वह इतना चिंतित हो जाता है कि उसके मन में कुछ और नहीं रहता। |
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| किन्तु हे गोपियो, मैं उन जीवों के प्रति भी तत्काल स्नेह प्रदर्शित नहीं कर पाता जो मेरी पूजा करते हैं। इसका कारण यह है कि मैं उनकी प्रेमाभक्ति को प्रगाढ़ बनाना चाहता हूँ। इससे वे ऐसे निर्धन व्यक्ति के सदृश हो जाते हैं जिसने पहले कुछ संपत्ति प्राप्त की थी किंतु बाद में उसे खो दिया है। इस तरह उसके बारे में वह इतना चिंतित हो जाता है कि उसके मन में कुछ और नहीं रहता। |
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