श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 32: पुन: मिलाप  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  10.32.19 
भजतोऽपि न वै केचिद् भजन्त्यभजत: कुत: ।
आत्मारामा ह्याप्तकामा अकृतज्ञा गुरुद्रुह: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
फिर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आध्यात्मिक तौर पर संतुष्ट हैं, सांसारिक दृष्टि से संपन्न हैं, या स्वभाव से कृतघ्न हैं या सहज ही श्रेष्ठ लोगों से ईर्ष्या करने वाले होते हैं। ऐसे लोग उन लोगों से भी प्रेम नहीं करते जो उनसे प्रेम करते हैं, तो फिर जो शत्रुता रखते हैं, उनके लिए क्या कहा जा सकता है?
 
फिर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आध्यात्मिक तौर पर संतुष्ट हैं, सांसारिक दृष्टि से संपन्न हैं, या स्वभाव से कृतघ्न हैं या सहज ही श्रेष्ठ लोगों से ईर्ष्या करने वाले होते हैं। ऐसे लोग उन लोगों से भी प्रेम नहीं करते जो उनसे प्रेम करते हैं, तो फिर जो शत्रुता रखते हैं, उनके लिए क्या कहा जा सकता है?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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