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श्लोक 10.32.17  |
श्रीभगवानुवाच
मिथो भजन्ति ये सख्य: स्वार्थैकान्तोद्यमा हि ते ।
न तत्र सौहृदं धर्म: स्वार्थार्थं तद्धि नान्यथा ॥ १७ ॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान ने कहा: जो तथाकथित मित्र आपस में अपना फायदा देखकर प्रेम जताते हैं, वे वास्तव में स्वार्थी होते हैं। न उनकी मित्रता सच्ची होती है और न ही वे धर्म के असली नियमों का पालन करते हैं। अगर उन्हें स्वयं को कोई फायदा न मिले तो वे प्यार नहीं कर सकते। |
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| भगवान ने कहा: जो तथाकथित मित्र आपस में अपना फायदा देखकर प्रेम जताते हैं, वे वास्तव में स्वार्थी होते हैं। न उनकी मित्रता सच्ची होती है और न ही वे धर्म के असली नियमों का पालन करते हैं। अगर उन्हें स्वयं को कोई फायदा न मिले तो वे प्यार नहीं कर सकते। |
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