विषजलाप्ययाद् व्यालराक्षसाद्
वर्षमारुताद् वैद्युतानलात् ।
वृषमयात्मजाद् विश्वतो भया-
दृषभ ते वयं रक्षिता मुहु: ॥ ३ ॥
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ, आपने हम सबों को अनेक संकटों से बचाया है—जैसे कि ज़हरीले जल से, भयंकर मनुष्य-भक्षक अघासुर से, मूसलाधार वर्षा से, भंवर से, इंद्र के अग्नि-तुल्य वज्र से, वृषासुर से और मय दानव के पुत्र से।
O best of men, you have repeatedly saved us from various kinds of dangers, such as from poisonous water, from the fearsome man-eating demon Agha, from torrential rain, from Trinavarta, from Indra's fiery thunderbolt, from Vrishasura and from the son of the demon Maya.
तात्पर्य
यहाँ गोपियाँ कहती हैं, "हे कृष्ण, तुमने हमें बहुत से भयंकर संकटों से बचाया, तो अब जब हम तुमसे विरह में मर रही हैं, तो फिर क्या तुम हमें नहीं बचाओगे?" श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि गोपियाँ अरिष्ट व व्याम का जिक्र इसलिए करती हैं क्योंकि भले ही कृष्ण ने अभी तक इन राक्षसों का वध नहीं किया था, फिर भी यह तथ्य कि वह भविष्य में उनका वध करेंगे, सर्वविदित था, जिसकी भविष्यवाणी ऋषि गर्ग और भगवान के जन्म के समय भगवान ने की थी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥