श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 28: कृष्ण द्वारा वरुणलोक से नन्द महाराज की रक्षा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  10.28.2 
तं गृहीत्वानयद् भृत्यो वरुणस्यासुरोऽन्तिकम् ।
अवज्ञायासुरीं वेलां प्रविष्टमुदकं निशि ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
वरुण का एक आसुरी सेवक, समय के अनुकूल न होने पर भी रात्रि के अंधेरे में जल में प्रवेश करने के कारण नंद महाराज को पकड़कर अपने स्वामी के पास ले आया।
 
वरुण का एक आसुरी सेवक, समय के अनुकूल न होने पर भी रात्रि के अंधेरे में जल में प्रवेश करने के कारण नंद महाराज को पकड़कर अपने स्वामी के पास ले आया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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