श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 28: कृष्ण द्वारा वरुणलोक से नन्द महाराज की रक्षा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  10.28.17 
नन्दादयस्तु तं द‍ृष्ट्वा परमानन्दनिवृता: ।
कृष्णं च तत्रच्छन्दोभि: स्तूयमानं सुविस्मिता: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
जब नंद महाराज और अन्य गोपालों ने उस दिव्य धाम को देखा तो उन्हें परम खुशी हुई। वे यह देखकर विशेष रूप से विस्मित थे कि कृष्ण स्वयं वहाँ विराजमान थे और चारों ओर वेदों का निवास था, जो उनकी स्तुति कर रहे थे।
 
जब नंद महाराज और अन्य गोपालों ने उस दिव्य धाम को देखा तो उन्हें परम खुशी हुई। वे यह देखकर विशेष रूप से विस्मित थे कि कृष्ण स्वयं वहाँ विराजमान थे और चारों ओर वेदों का निवास था, जो उनकी स्तुति कर रहे थे।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दस के अंतर्गत अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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