श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 25: कृष्ण द्वारा गोवर्धन-धारण  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  10.25.23 
क्षुत्तृड्‍‌‌‌व्यथां सुखापेक्षां हित्वा तैर्व्रजवासिभि: ।
वीक्ष्यमाणो दधाराद्रिं सप्ताहं नाचलत् पदात् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
अपनी भूख और प्यास को भूलकर और अपने आराम का ख्याल किए बिना भगवान कृष्ण पर्वत को थामे हुए सात दिनों तक वहीं खड़े रहे, और सारे व्रजवासी उन्हें निहारते रहे।
 
Forgetting hunger and thirst and putting aside all His personal comforts, Lord Krishna stood there holding the mountain for seven days and all the residents of Vraja kept gazing at Him.
तात्पर्य
विष्णु पुराण के अनुसार:

व्रजैक-वासिभिर्हर्ष-

विस्मिताक्षैर्नीरीक्षितः

गोप-गोपी-जनैर्हृष्टैः

प्रीति-विस्फारितेक्षणैः

सम्स्तूयमान-चरितः

कृष्णः शैलमधा रायत

"भगवान कृष्ण ने अपने ऊपर पर्वत को उठाया, इस समय व्रज के सभी निवासियों द्वारा उनकी स्तुति की जा रही थी। अब सभी के पास उनके साथ रहने का अवसर था, और वे उन्हें हर्ष और आश्चर्य से भरी हुई आँखों से देख रहे थे। इस प्रकार सभी गोप और गोपियाँ बहुत ही प्रसन्न थीं, और स्नेहवश उन्होंने अपनी आँखें चौड़ी कर लीं।"

श्री कृष्ण के सौंदर्य और माधुर्य के अमृत का लगातार पान करते हुए, वृंदावन के निवासियों को न तो भूख, न प्यास और न ही थकान महसूस हुई। भगवान कृष्ण ने भी उनके सुंदर रूपों को देखकर, खाना-पीना और सोना भूल गए। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि सांवर्तक बादलों से लगातार सात दिनों तक बारिश होती रही, लेकिन मथुरा का जिला बाढ़ में नहीं डूबा। क्योंकि सर्वोच्च भगवान ने अपनी शक्ति से जैसे ही पानी नीचे गिरा, वैसे ही उसे सुखा दिया। इस प्रकार गोवर्धन पर्वत को उठाना कृष्ण के लिए रोमांचक विवरणों से भरा हुआ है और हजारों सालों से यह उनके सबसे प्रसिद्ध मनोरंजनों में से एक बना हुआ है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)