श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 25: कृष्ण द्वारा गोवर्धन-धारण  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  10.25.2 
गणं सांवर्तकं नाम मेघानां चान्तकारीणाम् ।
इन्द्र: प्रचोदयत् क्रुद्धो वाक्यं चाहेशमान्युत ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
क्रोधित इन्द्र ने संवर्तक नाम के बादलों के उस समूह को भेजा जो पूरे ब्रह्मांड का विनाश करने में सक्षम थे। वे खुद को सर्वोच्च नियंत्रक मानते हुए इस प्रकार बोले।
 
The enraged Indra sent forth a host of clouds called Samvartaka, which destroyed the universe. He spoke as follows, thinking himself to be the supreme controller.
तात्पर्य
यहाँ ईश-मानी शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। इंद्र ने अहंकारवश खुद को भगवान मान लिया था, और इस प्रकार उन्होंने एक संचालित आत्मा के विशिष्ट रवैये का प्रदर्शन किया। बीसवीं शताब्दी के कई विचारकों ने हमारी संस्कृति की विशेषता वाले व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के अतिरंजित भाव को नोट किया है; वास्तव में, लेखकों ने "मी जनरेशन" वाक्यांश भी गढ़ा है। इस दुनिया में हर कोई कमोबेश ईश-मानी नामक सिंड्रोम का दोषी है, या गर्व से खुद को भगवान मानता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)