श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 22: कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  10.22.20 
इत्यच्युतेनाभिहितं व्रजाबला
मत्वा विवस्त्राप्लवनं व्रतच्युतिम् ।
तत्पूर्तिकामास्तदशेषकर्मणां
साक्षात्कृतं नेमुरवद्यमृग् यत: ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
इस तरह वृंदावन की उन बालिकाओं ने कृष्ण द्वारा कहे गये वचनों पर विचार करके यह स्वीकार कर लिया कि नदी में नग्न स्नान करने से वे अपने व्रत से पतित हुई हैं। लेकिन वे फिर भी अपने व्रत को सफलतापूर्वक पूरा करना चाहती थीं और क्योंकि भगवान कृष्ण स्वयं सभी धार्मिक कार्यों का परम फल हैं, अतः उन्होंने अपने सभी पापों को धोने के उद्देश्य से उन्हें नमन किया।
 
इस तरह वृंदावन की उन बालिकाओं ने कृष्ण द्वारा कहे गये वचनों पर विचार करके यह स्वीकार कर लिया कि नदी में नग्न स्नान करने से वे अपने व्रत से पतित हुई हैं। लेकिन वे फिर भी अपने व्रत को सफलतापूर्वक पूरा करना चाहती थीं और क्योंकि भगवान कृष्ण स्वयं सभी धार्मिक कार्यों का परम फल हैं, अतः उन्होंने अपने सभी पापों को धोने के उद्देश्य से उन्हें नमन किया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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