श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 21: गोपियों द्वारा कृष्ण के वेणुगीत की सराहना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  10.21.14 
प्रायो बताम्ब विहगा मुनयो वनेऽस्मिन्
कृष्णेक्षितं तदुदितं कलवेणुगीतम् ।
आरुह्य ये द्रुमभुजान् रुचिरप्रवालान्
श‍ृण्वन्ति मीलितद‍ृशो विगतान्यवाच: ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
अरी माँ! ये देखो ना, कृष्ण के दर्शन के लिए सारे पक्षी इस जंगल में उड़कर पेड़ों की सुंदर शाखाओं पर बैठ गए हैं। वे एकांत में आँखें मूँदकर सिर्फ़ उनकी बाँसुरी की मधुर ध्वनि को ही सुन रहे हैं और दूसरी किसी आवाज़ की ओर आकर्षित नहीं हो रहे। सचमुच में ये पक्षी तो महामुनियों के समान हैं।
 
Oh mother! To see Krishna, all the birds in this forest have flown and sat on the beautiful branches of the trees. They are listening to the sweet sound of his flute in solitude with their eyes closed and they are not attracted to any other sound. Truly, these birds are of the category of great sages.
तात्पर्य
अरण्य में रहने, आंखें बंद रखने, मौन का पालन करने और निश्‍चल बने रहने के कारण पक्षी ऋषि-मुनियों की तरह होते हैं। महत्‍वपूर्ण रूप से, यहाँ यह कहा गया है कि महान ऋषि-मुनि भी कृष्‍ण की बाँसुरी की धुन से पागल हो जाते हैं, जो पूर्ण रूप से आध्‍यात्मिक कंपन है।

रूचिर-प्रवालान शब्‍द दर्शाता है कि कृष्‍ण की बाँसुरी के गीत के कंपन से टकराने पर वृक्षों की डालियाँ भी वशीभूत हो जाती हैं। आदि-देव होने के कारण, इंद्र, ब्रह्मा, शिव और विष्‍णु पूरे ब्रह्मांड में विचरण करते हैं और उन्‍हें संगीत के विज्ञान का व्‍यापक ज्ञान है, और फिर भी इन महान विभूति‍यों ने भी कृष्‍ण की बाँसुरी जैसा संगीत कभी ना सुना है और ना ही बनाया है। निश्‍चय ही, पक्षी उस आनंदमय धुन से इतने विचलित हो जाते हैं कि अपने वशीभूत होकर वे अपनी आँखें बंद कर लेते हैं और पेड़ों से गिरने से बचने के लिए डालियों से चिपक जाते हैं।

श्रील विश्‍वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि गोपियाँ कभी-कभी एक-दूसरे को अम्‍बा, "माँ" कह कर संबोधित करती थीं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)