श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  10.16.54 
श्रीशुक उवाच
इत्थं स नागपत्नीभिर्भगवान् समभिष्टुत: ।
मूर्च्छितं भग्नशिरसं विससर्जाङ्‍‍‍‍‍घ्रिकुट्टनै: ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: इस प्रकार नागपत्नियों की प्रशंसा से प्रसन्न होकर भगवान ने कालिय सांप को मुक्त कर दिया, जो मूर्छित होकर गिर गया था और जिसके सिर भगवान के चरणकमलों के प्रहार से चोटग्रस्त हो गए थे।
 
Sukadeva Gosvami said: The Lord, thus praised by the wives of serpents, released the serpent Kaliya, who had fallen unconscious and whose head was mutilated by the blows of the Lord's lotus feet.
तात्पर्य
श्रीला विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, भगवान कृष्ण अपने निर्णय पर पहुंचने के बाद, तुरंत कालिया के फनों से नीचे कूद गए और सर्प और उसकी पत्नियों के सामने खड़े हो गए। हमें याद रखना चाहिए कि जब भगवान कृष्ण ने ये लीलाएँ कीं, तब वे वृंदावन में सिर्फ एक युवा गाँव के लड़के थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)