Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 10.16.33: कालिय सर्प की पत्नियों ने कहा: निस्संदेह, इस अपराधी को जो दंड मिला है वह उचित है। इस संसार में आपका अवतार ईर्ष्यालु और क्रूर लोगों का दमन करने के लिए ही हुआ है। आप इतने निष्पक्ष हैं कि आप शत्रुओं और अपने पुत्रों को समान भाव से देखते हैं क्योंकि जब आप किसी प्राणी को दंड देते हैं, तो आप जानते हैं कि अंततः यह उसके हित के लिए है। | bhagavat अध्याय 10.16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा । bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
कालिय सर्प की पत्नियों ने कहा: निस्संदेह, इस अपराधी को जो दंड मिला है वह उचित है। इस संसार में आपका अवतार ईर्ष्यालु और क्रूर लोगों का दमन करने के लिए ही हुआ है। आप इतने निष्पक्ष हैं कि आप शत्रुओं और अपने पुत्रों को समान भाव से देखते हैं क्योंकि जब आप किसी प्राणी को दंड देते हैं, तो आप जानते हैं कि अंततः यह उसके हित के लिए है।
The wives of the serpent Kaliya said: The punishment meted out to this criminal is undoubtedly just. You have taken incarnation in this world only to suppress jealous and cruel men. You are so impartial that you look upon enemies and your own sons equally because when you punish a living being, you know that ultimately it is for his benefit.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥