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bhagavat 10.16.28: हे राजन! कालिय के १०१ प्रमुख फन थे और यदि इनमें से कोई एक नहीं झुकता था, तो श्रीकृष्ण, जो निर्दयी अत्याचारी को दंड देने वाले हैं, अपने पैरों से उस ढीठ फन को कुचल देते थे। फिर, जब कालिय मृत्यु के द्वार पर पहुँच गया, तो वह अपने फनों को इधर-उधर घुमाने और अपने मुँह और नासिका से खूनी उल्टी करने लगा। इस तरह सर्प को अत्यधिक दर्द और पीड़ा का अनुभव हुआ।   |   bhagavat अध्याय 10.16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा   ।   bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  10.16.28 
यद् यच्छिरो न नमतेऽङ्ग शतैकशीर्ष्ण-
स्तत्तन् ममर्द खरदण्डधरोऽङ्‍‍‍‍‍घ्रिपातै: ।
क्षीणायुषो भ्रमत उल्बणमास्यतोऽसृङ्
नस्तो वमन् परमकश्मलमाप नाग: ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! कालिय के १०१ प्रमुख फन थे और यदि इनमें से कोई एक नहीं झुकता था, तो श्रीकृष्ण, जो निर्दयी अत्याचारी को दंड देने वाले हैं, अपने पैरों से उस ढीठ फन को कुचल देते थे। फिर, जब कालिय मृत्यु के द्वार पर पहुँच गया, तो वह अपने फनों को इधर-उधर घुमाने और अपने मुँह और नासिका से खूनी उल्टी करने लगा। इस तरह सर्प को अत्यधिक दर्द और पीड़ा का अनुभव हुआ।
 
O King, Kaliya had 101 heads and if any one of them did not bow down, Lord Krishna, the punisher of cruel acts, would crush the impudent head with His foot. When Kaliya was near death, he began to move his heads in all directions and began to vomit blood from his mouth and nostrils. In this way, the serpent began to experience extreme pain and suffering.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)