श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 16: कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  10.16.27 
तं नर्तुमुद्यतमवेक्ष्य तदा तदीय-
गन्धर्वसिद्धमुनिचारणदेववध्व: ।
प्रीत्या मृदङ्गपणवानकवाद्यगीत-
पुष्पोपहारनुतिभि: सहसोपसेदु: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
जब उन्होंने भगवान को नाचते देखा, स्वर्गलोक के उनके सेवक—गंधर्व, सिद्ध, मुनि, चारण और देवी-देवताओं की पत्नियाँ—तुरंत वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने बड़ी खुशी के साथ मृदंग, पणव और आनक जैसे ढोल बजा-बजाकर कृष्ण के नृत्य का साथ दिया। उन्होंने गीत, फूल और प्रार्थनाएँ भी चढ़ाईं।
 
Seeing the Lord dancing, His servants from heaven—Gandharvas, Siddhas, sages, caranas and wives of gods—immediately came there. They accompanied Krishna's dance by playing drums such as mridanga, panava and anaka. They also offered songs, flowers and praises.
तात्पर्य
जब देवता और अन्य उच्च लोकवासियों को पता चला कि भगवान श्री कृष्ण स्वयं नृत्य कला का एक अद्भुत प्रदर्शन करने जा रहे हैं, तो वे तुरंत उनकी सेवा में उपस्थित हुए। नृत्य का आनंद और सौंदर्य बढ़ जाता है जब इसके साथ विशेषज्ञ ड्रम-वादन, गायन और प्रार्थनाओं का उच्चारण किया जाता है। भगवान श्री कृष्ण की कलात्मक अभिव्यक्ति और भी बढ़ गई थी, क्योंकि कालिया सर्प के फनों पर नृत्य करते हुए उन पर पुष्पों की वर्षा की जा रही थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)